भारतीय संस्कृति और महिला सशक्तीकरण पर केंद्रित रहा हरियाणा युवा संवाद-2026, 15 राज्यों के 90 युवाओं ने लिया भाग
कार्यक्रम के बाद विस अध्यक्ष ने युवाओं प्रतिभागियों के साथ की चाय पर मंत्रणा
विधान सभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल भाव स्वयं से पहले दूसरों के हितों और कल्याण की चिंता करना है। यही भावना समाज में परस्पर सहयोग, सद्भाव और समरसता को मजबूत बनाती है। उन्होंने कहा कि संविधान हमारे अधिकारों और कर्तव्यों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसके मूल्यों को समझना और उन्हें अपने आचरण में उतारना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। हमें महापुरुषों के आदर्शों को आत्मसात करना चाहिए। उनकी जयंती केवल आयोजन करने तक सीमित न रहे, बल्कि उनके विचारों और जीवन मूल्यों को अपने व्यवहार में भी अपनाना चाहिए। हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने दायित्वों के प्रति सावधान रहना चाहिए।
दुनिया के मौजूदा हालात का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसका बड़ा कारण जीवन मूल्यों में सौहार्द और सहिष्णुता की कमी तथा भौतिक विकास की अंधाधुंध दौड़ है। इसके विपरीत, भारतीय संस्कृति हमें सहिष्णुता, परस्पर सम्मान और सबके कल्याण की भावना के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
कल्याण ने कहा कि युवाओं को आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए अपनी क्षमताओं और दक्षताओं का विकास करना चाहिए, लेकिन विकास तभी सार्थक होगा, जब इसके साथ जीवन मूल्यों और संस्कारों को भी बनाए रखा जाए। जिस प्रकार किसी भवन की मजबूती उसकी नींव और वृक्ष का अस्तित्व उसकी गहरी जड़ों पर निर्भर करता है, उसी प्रकार मानव जीवन की मजबूती का आधार उसके संस्कार होते हैं। दूसरों के हितों को प्राथमिकता देना और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव रखना इन्हीं संस्कारों का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने हमें एक अनूठी संसदीय व्यवस्था दी है, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को उनकी विशिष्ट भूमिकाओं, अधिकारों और जिम्मेदारियों के साथ स्थापित किया गया है। उन्होंने डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि इन सभी ने कठिन पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद अपनी प्रतिभा, परिश्रम और संकल्प के बल पर विशिष्ट उपलब्धियां हासिल की हैं तथा देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज इस सदन में उपस्थित अधिकांश युवा उन परिस्थितियों से आगे निकल चुके हैं और उनके सामने अपनी प्रतिभा को निखारने तथा समाज और राष्ट्र के लिए योगदान देने के अनेक अवसर हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इनमें से अनेक युवा भविष्य में अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए उच्च मुकाम हासिल करेंगे।
इससे पूर्व, उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विधान सभा उपाध्यक्ष डॉ. कृष्ण लाल मिड्ढा ने कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है, जब समाज के सभी वर्गों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित भागीदारी मिले।
उन्होंने कहा कि महिला सशक्तीकरण केवल महिलाओं का विषय नहीं, बल्कि पुरुषों और महिलाओं दोनों की साझा जिम्मेदारी है। जिस समाज में महिलाओं को समान सम्मान और अवसर मिलते हैं, वहां एक बेहतर, समावेशी और स्वस्थ सामाजिक वातावरण विकसित होता है। उन्होंने चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय नारियों ने अपने साहस, त्याग और आदर्शों से समाज के सामने प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।
डॉ. मिड्ढा ने कहा कि हरियाणा की अनेक बेटियों ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर यह साबित किया है कि प्रतिभा किसी सीमा में बंधी नहीं होती। इसके लिए सही अवसर, उचित मार्गदर्शन और परिवार का विश्वास महत्वपूर्ण है। आज की पीढ़ी को इस सोच को और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि आने वाले समय में किसी भी बेटी को अपनी प्रतिभा साबित करने के लिए अतिरिक्त संघर्ष न करना पड़े।
संवाद के विभिन्न सत्रों में युवा प्रतिभागियों ने संवैधानिक मूल्यों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने और महिला सशक्तीकरण को प्रभावी बनाने के लिए अनेक व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉलेजों में महिला राजनीतिक नेतृत्व कार्यक्रम शुरू किए जाएं, जिनके माध्यम से छात्राओं को उनके संवैधानिक अधिकारों, चुनाव प्रक्रिया और शासन व्यवस्था की जानकारी दी जा सके। इसके साथ ही शिक्षण संस्थानों में मॉक पार्लियामेंट और मॉक विधानसभाओं का आयोजन किया जाए, ताकि विद्यार्थी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को व्यावहारिक रूप से समझ सकें।
युवाओं ने अनुभवी विधायकों, सांसदों और सरपंचों को युवा महिला नेतृत्व की इच्छुक प्रतिभाओं से जोड़ने के लिए मेंटरशिप कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में नागरिक एवं संसदीय नेतृत्व से संबंधित व्यावहारिक पाठ्यक्रम लागू करने तथा कॉलेजों में संचालित विधिक साक्षरता प्रकोष्ठों को और सशक्त बनाने पर जोर दिया। एक सुझाव में रवांडा का उदाहरण देते हुए कहा गया कि वहां संविधान के तहत संसद और निर्णय लेने वाले निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व का प्रावधान है। इसी तर्ज पर भारत में भी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य आरक्षण की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
एक युवा प्रतिभागी ने कहा कि महिला सशक्तीकरण का उद्देश्य केवल विधायिकाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि हर लड़की को इतना सक्षम बनाना भी होना चाहिए कि वह आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले सके और राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा सके। इस अवसर पर राजधानी युवा संसद की एडवोकेट ईशा कपूर और जय सैनी भी मौजूद रहे।


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