*1984 के नरसंहार की साजिश दिल्ली में कांग्रेस की बैठक के दौरान रची गई: तरलोचन सिंह*
*वाजपेयी और मोदी सरकारों ने दिलाया न्याय : आत्मा सिंह लुबाना*चंडीगढ़, 4 नवंबर : भारतीय जनता पार्टी पंजाब द्वारा चंडीगढ़ में आयोजित 1984 के सिख नरसंहार से संबंधित ‘ज़ख्म 84 दे’ सम्मेलन के तीसरे सत्र ‘क्या 1984 का सिख नरसंहार एक साजिश थी?’ के दौरान वक्ताओं ने कहा कि नवंबर 1984 का सिख नरसंहार एक सोची-समझी साजिश थी। उन्होंने 1984 के सिख नरसंहार से जुड़े कई महत्वपूर्ण और अनसुने पहलुओं को साझा करते हुए कहा कि यह भारत के इतिहास की ऐसी दर्दनाक त्रासदी है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
*1984 के नरसंहार को रोकने के लिए समय रहते कदम नहीं उठाए गए: तरलोचन सिंह*
इस सत्र को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य तरलोचन सिंह ने कहा कि 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा कर्मियों ने गोलियां मारी थीं। उनके अनुसार, इंदिरा गांधी की मृत्यु लगभग उसी समय हो गई थी, लेकिन नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण तक इसकी आधिकारिक घोषणा में देरी की गई।
उन्होंने दावा किया कि इस दौरान कांग्रेस नेताओं की एक बैठक हुई और उसमें 'खून का बदला खून' जैसे नारे लगाने की बात सामने आई, जिसके बाद दिल्ली में सिखों के खिलाफ हिंसा फैल गई।
*गृह मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव से पुलिस का नियंत्रण वापस ले लिया गया था: जीबीएस सिद्धू*
इस अवसर पर वीडियो प्रस्तुति के माध्यम से रॉ (RAW) के पूर्व विशेष निदेशक जीबीएस सिद्धू ने कहा कि इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 31 अक्टूबर 1984 को गृह मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव से पुलिस का नियंत्रण वापस ले लिया था।
उन्होंने कहा कि पी.वी. नरसिम्हा राव की जीवनी में भी उल्लेख है कि जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को दंगों की जानकारी मिली तो उन्होंने गृह मंत्री को फोन किया, लेकिन गृह मंत्री ने उनका फोन तक नहीं उठाया।
सिद्धू ने बताया कि गृह मंत्री इतने असहाय हो गए थे कि हैदराबाद से आए अपने एक मित्र को भी दंगाइयों से नहीं बचा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि राजीव गांधी ने चुनाव जीतने और अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या का बदला लेने के लिए हजारों सिखों की हत्या करवा दी।
*पंजाब में हिंदू-सिख भाईचारा और शांति बरकरार रही: साहनी*
राज्यसभा सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी ने कहा कि उस दौरान दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में सिखों को निशाना बनाया गया, लेकिन इसके बावजूद पंजाब में हिंदू-सिख समुदाय ने आपसी भाईचारे और शांति को कायम रखा। उन्होंने कहा कि यह पंजाब की सांझीवालता और सामुदायिक एकता का एक बड़ा उदाहरण है।
साहनी ने कहा कि 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जो घटनाएं हुईं, वे देश के इतिहास का बेहद दर्दनाक अध्याय हैं। अगले तीन-चार दिनों के दौरान सिखों के घरों, दुकानों और संपत्तियों को निशाना बनाया गया तथा कई स्थानों पर सिखों को रेलगाड़ियों से उतारकर उनकी हत्या कर दी गई।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश के विभिन्न शहरों में सैन्य छावनियां मौजूद थीं, तो समय रहते सेना की तैनाती क्यों नहीं की गई?
*आत्मा सिंह लुबाना ने सुनाई अपनी आपबीती*
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के उपाध्यक्ष आत्मा सिंह लुबाना ने 1984 के सिख नरसंहार के दौरान अपने परिवार के साथ हुई दर्दनाक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने नानावती आयोग का गठन किया था। दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी की ओर से एच.एस. फूलका के नेतृत्व में वकीलों का एक पैनल भी बनाया गया था।
उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने पीड़ितों को न्याय दिलाने का भरोसा दिया था।
उन्होंने कहा कि 10 अगस्त 2005 को तिलक विहार के पीड़ित परिवारों ने संसद के बाहर धरना दिया था। इस संघर्ष के बाद पांच नए मामले दर्ज किए गए, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर के खिलाफ भी मामले शामिल थे।
उन्होंने कहा कि आज भी पीड़ित परिवार अदालतों में गवाहों के साथ मजबूती से खड़े हैं और न्याय के लिए उनका संघर्ष लगातार जारी है।

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